रविवार, 23 अगस्त 2015

मुझसे तुम कुछ कहना चाहो

उस पल को मैं ढूंढ रहा हूँ
सोचों में तुम बसना चाहो
भावों में तुम बहना चाहो
मुझसे तुम कुछ कहना चाहो

बीते पल जो कड़वे थे कुछ
आशाओं के टुकड़े थे कुछ
आंसू बनके निकले थे कुछ
अब तुम आगे बढ़ना चाहो
मुझसे तुम कुछ कहना चाहो

गुज़रे कल के अफ़सानों को
जो अपने थे उन बेगानों को
रोकर के निकाले तूफानों को
भूल के तुम अब हंसना चाहो
मुझसे तुम कुछ कहना चाहो

इन यादों की अंगड़ाईयों में
अंतर्मन की गहराइयों में
मेरी अपनी तन्हाइयों में
मेरे संग तुम रहना चाहो
मुझसे तुम कुछ कहना चाहो

अपने ग़म को मुझको देकर
खुशियों की हरियाली लेकर
जीवन के पथरीले पथपर
बन हमराही चलना चाहो
मुझसे तुम कुछ कहना चाहो...

प्रकाश पाखी।

मंगलवार, 12 मई 2015

न्याय

ऐसे कैसे पैसे से
बिक कर बस हो जाता न्याय
मासूमों को कुचल किनारे
थक कर फिर सो जाता न्याय

रूपये भर की रिश्वत पर
तीस साल तक केस चले
जेलों की कोठरियों में
जाकर फिर खो जाता न्याय

तगड़े तगड़े पैसे वाले
तगड़े उनके पैरोकार
हार मानकर हामी भरता
इनके घर जो जाता न्याय

अरबों खरबों लूट गए
देखो फिर भी छूट गए
रामम नामम सत्यम फिर
ऐसे ही हो जाता न्याय

ईंट ईंट का बना घरौंदा
तिनका तिनका छत बनी
बुलडोजर से बिखर जाए तो
हो बेघर रो जाता न्याय

पेट किसी का फाड़ दिया
लूटी अस्मत मार दिया
अब सुधरेगा कम आयु है
बच्चा तब हो जाता न्याय

धनवानों की रक्षा करता
उनका अपना प्यारा श्वान
हाथ गरीबों के तोते सा
उड़ जाता खो जाता न्याय।

प्रकाश पाखी।


रविवार, 10 मई 2015

सोने सी सच्ची वो मुझको रोज मनाती मेरी माँ



चैन से सारी रात मैं सोता, जागी रहती मेरी मां 
नींद उमचता जब भी मैं तो थपकी देती मेरी मां

आंगन में  किलकारी भर भर ता ता थैया दौड़ा था
जब भी गिरने लगता था मैं पीछे रहती मेरी मां

पट्टी पुस्‍तक, बस्‍ता देकर छोड़ तो आई थी मुझको 
शाला में रोता था मैं और घर पर रोती मेरी मां

गुस्से पर उसके गुस्सा कर मैं भूखा सो जाता था 
मेरे खाना खा लेने तक रहती भूखी मेरी मां

अपनी गलती पर भी झगड़ा कर मैं रूठा करता था
सोने सी सच्ची वो मुझको रोज मनाती मेरी माँ

 कक्षा में अव्वल आकर जब उसके अंक लिपटता था
आंखों में आंसू भर कर बस हंसती रहती मेरी मां

उम्र हुई है लेकिन अब भी वो जैसे की तैसी है
बेटे ने खाना खाया क्या पूछा करती मेरी माँ 

  प्रकाश पाखी 

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

आजनाइशों से मेरे ऐतबार गुज़रे है

हम गली से उनकी क्यों बार बार गुज़रे हैं
बे अना लगे उन्हें नागवार गुजरे है

बेरुखी थी फ़िक्र भी खिदमतों की चाह भी
आजमाईशों से मेरे ऐतबार गुज़रे हैं

चाहतों की जंग में गिर पड़े जो तुम तो क्या
राहे ईश्क गिर पड़े शहसवार गुज़रे है

जीत के जहाँ कई खाकसार हो गए
कोहे वक्त में कई जीत हार गुज़रे है

कौम पर जो मर मिटे जिंदगी उन्हीं की है
इस जहाँ में बाकि सब बन के भार गुज़रे है।

-प्रकाश पाखी
अना-स्वाभिमान.
कोहेवक्त-समय की गुफा

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

मोम सी तुम आती नज़र, बस पिघलती नहीं...

आसमाँ से जमीं सी तुम मगर मिलती नहीं
इस तरह मेरे ख़यालों से भी निकलती नहीं

आतिशे ईश्क का दरिया भी मैंने बहा डाला
मोम सी तुम आती नजर, बस पिघलती नहीं

उम्र की कमसिन नदी सी शुरुआत यहीं से है
कब जवानी भला इन ढलानों से फिसलती नहीं

हौसला गर न तुम बढ़ाती मेरा बस खामोश रहकर
तुमको पाने की तमन्ना भी इस कदर मचलती नहीं

आशियाने में ही आजाओ मेरे इक सलीका लेकर
बेतरतीब सी जिंदगानी अब मुझसे संभलती नहीं

प्रकाश पाखी

रविवार, 5 अप्रैल 2015

एक कविता याद पुरानी

जिन गलियों में तुम और मैं
कदम कदम पर साथ चले
उन गलियों की उड़ती धूल
मन में मीलों महक रही है

चौराहे पर कितने घण्टे
बातें करते बिता दिए थे
मूंगफलियों के बिखरे छिलके
कुछ कुछ दानें मेरे भी थे

वो परीक्षा की तैयारी
कितनी रातों साथ जगे थे
चाय बनाना किसकी बारी
चुस्की चुस्की याद मुझे है

होटल की वो आधी चाय
पूरा पूरा दिन ले लेती
ऊंचे सुर के हंसी ठहाके
खुश खुश चेहरे आज कहाँ है

बारातों में घोड़ी आगे
नच नच भंगड़े जो किये थे
इक लड़की जो ताने कसती
खिल खिल हंसती यादों में है

मूवी में जो तीखी सीटी
बजा बजा कर मजे लिए थे
आगे बैठी सुंदर लड़की
अंदर अंदर बसी हुई है

मंदिर चढ़ कर चढ़े चढ़ावे
कर बंटवारा बांटे जो थे
उनको खाते देखे सपने
सच सच कहना आज कहाँ है
-प्रकाश पाखी
(जून 1994 को दोस्तों की याद में लिखी एक पुरानी कविता)

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

आसमान पे मन सवार क्यूँ



इस कदर दिल बेकरार क्यूँ
तेरे जिक्र का इंतज़ार क्यूँ

तेरी आरजू बस न और कुछ
आसमान पे मन सवार क्यूँ


हंस के ना कहो तोड़ दो ये दिल
कत्ल हो मेरा बारबार क्यूँ

काँटों से भरी तेरी राह क्यूँ
ईश्क हो मेरा तारतार क्यूँ

गर है प्यार जो नेमते खुदा
घर में प्यार के ग़म हज़ार क्यों

तुम हो जानती मेरे मन में क्या
बेरुख़ी अब मेरे यार क्यूँ।
-प्रकाश पाखी

बुधवार, 21 जनवरी 2015

ज़ब से जानी ग़म की फितरत...



दर्द बिखरा है यहाँ पर है हंसी सोई हुई
चैन किसको,हर जग़ह ज़ब बेबसी सोई हुई

उस पिता का दर्द देखो नूर जिसका चल दिया
आज है ताबूत में इक वापसी सोई हुई

बाग़ था ख़ामोश बिलकुल रात रोई रात भर
वहशियों ने ज़ब कुचल दी हर कली सोई हुई

चाँद से आई उतरकर डालियों पर झूल कर
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

जब से जानी ग़म की फितरत फ़िक्र मैं करता नहीं
पास में हर ग़म के जो थी इक ख़ुशी सोई हुई।

प्रकाश पाखी