संदेश

देह देखते हो

रिश्तों के जतन है जिंदगी सुखन है है प्रेम भीतर और अपनापन है जलन भी है यहां, और एक चुभन है हाँ,मेरे पास भी मेरा अपना मन है तुम न प्यार देखते न ही नेह देखते हो तुम तो सिर्फ मेरी देह देखते हो। थकता हुआ जरा सा विश्राम चाहता है मिल जाए गर जरा आराम चाहता है खुद के साथ गुज़ार लूं मेरा ही अकेलापन है ताउम्र मेरे साथ होगा मेरा अपना बदन है। मेरी भी अपनी इच्छा है, इक मेरी भी निजता है पर कहाँ तुम सब ये देखते हो तुम तो सिर्फ मेरी देह देखते हो। इंसान ही हूँ मैं सिर्फ तन नहीं हूं ताले न लगा मुझ पर मैं धन नहीं हूं विवश गर हूं मैं तो उसमें तेरा दोष है मुझे जो बांधती है सिर्फ तेरी सोच है जो मैं नहीं हूं तुम उसे देखते हो तुम तो सिर्फ़ मेरी देह देखते हो। तुम्हें है जो देखना तुम वही देखते हो मेरे भीतर आग भी तुम नहीं देखते हो प्रचंड पवन मन की न तुम कहीं देखते हो न आंखो से बरसता तुम मेह देखते हो तुम तो सिर्फ मेरी देह देखते हो। प्रकाश सिंह

फैमिली

चुप चुप सी होली जाती अब ख़ामोशी से राखी आती दीवाली को दिल बेगाने कैसी सबकी है लाचारी बचपन बीता, सबकुछ रीता बंद बंद सी बोलचाल है प्रेम प्यार भी खो गए सारे अब छुप गयी है खुशियाँ सारी कैसे किसको दिखलाना है कैसे किसको नीचे लाना बचा तो केवल अहम वहम है और तानों की मारामारी नफ़रत होती अपनों से अब बेगानों से तगड़ी यारी लहू के रिश्ते,लगें पराये निभजाती है दुनियादारी मतलब से सब मतलब रखते मतलब की है रिश्तेदारी सबसे पहले बदली भौजी फिर भाइयों की आई बारी छुटकी मुन्ना हुए बड़े अब ताया भैया नज़र न आते अपनों के अपमानों में अब मिलती सबको ख़ुद मुख्तारी बहनें भी कहाँ नज़र मिलाती सुने वही जो सुनना चाहती कमियां इतनी,रही गिनाती उलाहनों से ममता हारी सबके अपने अपने रस्ते और खुशियों की अपनी बारी मेरी तो बस फैमिली है माँ बापू और जिम्मेदारी प्रकाश पाख़ी

जुबाँ चुप रहे क्यूँ,तेरी हादसों पर

"दिखा लाल है रंग रंगों से ज्यादा खतरनाक सड़कें हैं बमों से ज्यादा बीमारी से ज्यादा और दंगों से ज्यादा बहा खून सड़कों पर जंगों से ज्यादा" *************************** ये तकरार है हो रही बोलियों पर भड़कते हैं क्यूँ जात पर मजहबों पर फड़कते है बाजू तेरे गोलियों पर जुबाँ चुप रहे क्यूँ तेरी हादसों पर नशा और सफ़र साथ करना कभी ना कि तब मौत है नाचती रास्तों पर जो रफ़्तार से बढ़ चले ज़िन्दगी में थे उनके सफर थम गए हादसों पर पहन लो ये हेलमेट बेल्ट अब लगा लो बचोगे न तुम कर यकीं टोटकों पर डरा मौत से हूँ नहीं आज तक मैं गवारा नहीं है मरूं रास्तों पर मेरा खून है तो अमानत वतन की अगर मौत आये तो मरूं सरहदों पर मुहाफ़िज़ न बच्चे न पैदल यहाँ पर बड़ी बेरहम है सड़क सिग्नलों पर ओ ईनाम लौटाने वालों कहो कुछ मैं हैरान हूँ तेरी खामोशियों पर प्रकाश पाखी

मुझसे तुम कुछ कहना चाहो

उस पल को मैं ढूंढ रहा हूँ सोचों में तुम बसना चाहो भावों में तुम बहना चाहो मुझसे तुम कुछ कहना चाहो बीते पल जो कड़वे थे कुछ आशाओं के टुकड़े थे कुछ आंसू बनके निकले थे कुछ अब तुम आगे बढ़ना चाहो मुझसे तुम कुछ कहना चाहो गुज़रे कल के अफ़सानों को जो अपने थे उन बेगानों को रोकर के निकाले तूफानों को भूल के तुम अब हंसना चाहो मुझसे तुम कुछ कहना चाहो इन यादों की अंगड़ाईयों में अंतर्मन की गहराइयों में मेरी अपनी तन्हाइयों में मेरे संग तुम रहना चाहो मुझसे तुम कुछ कहना चाहो अपने ग़म को मुझको देकर खुशियों की हरियाली लेकर जीवन के पथरीले पथपर बन हमराही चलना चाहो मुझसे तुम कुछ कहना चाहो... प्रकाश पाखी।

न्याय

ऐसे कैसे पैसे से बिक कर बस हो जाता न्याय मासूमों को कुचल किनारे थक कर फिर सो जाता न्याय रूपये भर की रिश्वत पर तीस साल तक केस चले जेलों की कोठरियों में जाकर फिर खो जाता न्याय तगड़े तगड़े पैसे वाले तगड़े उनके पैरोकार हार मानकर हामी भरता इनके घर जो जाता न्याय अरबों खरबों लूट गए देखो फिर भी छूट गए रामम नामम सत्यम फिर ऐसे ही हो जाता न्याय ईंट ईंट का बना घरौंदा तिनका तिनका छत बनी बुलडोजर से बिखर जाए तो हो बेघर रो जाता न्याय पेट किसी का फाड़ दिया लूटी अस्मत मार दिया अब सुधरेगा कम आयु है बच्चा तब हो जाता न्याय धनवानों की रक्षा करता उनका अपना प्यारा श्वान हाथ गरीबों के तोते सा उड़ जाता खो जाता न्याय। प्रकाश पाखी।

सोने सी सच्ची वो मुझको रोज मनाती मेरी माँ

चैन से सारी रात मैं सोता, जागी रहती मेरी मां  नींद उमचता जब भी मैं तो थपकी देती मेरी मां आंगन में  किलकारी भर भर ता ता थैया दौड़ा था जब भी गिरने लगता था मैं पीछे रहती मेरी मां पट्टी पुस्‍तक, बस्‍ता देकर छोड़ तो आई थी मुझको  शाला में रोता था मैं और घर पर रोती मेरी मां गुस्से पर उसके गुस्सा कर मैं भूखा सो जाता   था   मेरे खाना खा लेने तक रहती भूखी मेरी मां अपनी गलती पर भी झगड़ा कर मैं रूठा करता था सोने सी सच्ची वो मुझको रोज मनाती मेरी   माँ   कक्षा में अव्वल आकर जब उसके अंक लिपटता था आंखों में आंसू भर कर बस हंसती रहती मेरी मां उम्र हुई है लेकिन अब भी वो जैसे की तैसी है बेटे ने खाना खाया क्या पूछा करती मेरी माँ      प्रकाश पाखी 

आजनाइशों से मेरे ऐतबार गुज़रे है

हम गली से उनकी क्यों बार बार गुज़रे हैं बे अना लगे उन्हें नागवार गुजरे है बेरुखी थी फ़िक्र भी खिदमतों की चाह भी आजमाईशों से मेरे ऐतबार गुज़रे हैं चाहतों की जंग में गिर पड़े जो तुम तो क्या राहे ईश्क गिर पड़े शहसवार गुज़रे है जीत के जहाँ कई खाकसार हो गए कोहे वक्त में कई जीत हार गुज़रे है कौम पर जो मर मिटे जिंदगी उन्हीं की है इस जहाँ में बाकि सब बन के भार गुज़रे है। -प्रकाश पाखी अना-स्वाभिमान. कोहेवक्त-समय की गुफा