शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

फैमिली

चुप चुप सी होली जाती अब
ख़ामोशी से राखी आती
दीवाली को दिल बेगाने
कैसी सबकी है लाचारी

बचपन बीता, सबकुछ रीता
बंद बंद सी बोलचाल है
प्रेम प्यार भी खो गए सारे
अब छुप गयी है खुशियाँ सारी

कैसे किसको दिखलाना है
कैसे किसको नीचे लाना
बचा तो केवल अहम वहम है
और तानों की मारामारी

नफ़रत होती अपनों से अब
बेगानों से तगड़ी यारी
लहू के रिश्ते,लगें पराये
निभजाती है दुनियादारी

मतलब से सब मतलब रखते
मतलब की है रिश्तेदारी
सबसे पहले बदली भौजी
फिर भाइयों की आई बारी

छुटकी मुन्ना हुए बड़े अब
ताया भैया नज़र न आते
अपनों के अपमानों में अब
मिलती सबको ख़ुद मुख्तारी

बहनें भी कहाँ नज़र मिलाती
सुने वही जो सुनना चाहती
कमियां इतनी,रही गिनाती
उलाहनों से ममता हारी

सबके अपने अपने रस्ते
और खुशियों की अपनी बारी
मेरी तो बस फैमिली है
माँ बापू और जिम्मेदारी

प्रकाश पाख़ी