बुधवार, 22 अप्रैल 2015

आजनाइशों से मेरे ऐतबार गुज़रे है

हम गली से उनकी क्यों बार बार गुज़रे हैं
बे अना लगे उन्हें नागवार गुजरे है

बेरुखी थी फ़िक्र भी खिदमतों की चाह भी
आजमाईशों से मेरे ऐतबार गुज़रे हैं

चाहतों की जंग में गिर पड़े जो तुम तो क्या
राहे ईश्क गिर पड़े शहसवार गुज़रे है

जीत के जहाँ कई खाकसार हो गए
कोहे वक्त में कई जीत हार गुज़रे है

कौम पर जो मर मिटे जिंदगी उन्हीं की है
इस जहाँ में बाकि सब बन के भार गुज़रे है।

-प्रकाश पाखी
अना-स्वाभिमान.
कोहेवक्त-समय की गुफा

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

मोम सी तुम आती नज़र, बस पिघलती नहीं...

आसमाँ से जमीं सी तुम मगर मिलती नहीं
इस तरह मेरे ख़यालों से भी निकलती नहीं

आतिशे ईश्क का दरिया भी मैंने बहा डाला
मोम सी तुम आती नजर, बस पिघलती नहीं

उम्र की कमसिन नदी सी शुरुआत यहीं से है
कब जवानी भला इन ढलानों से फिसलती नहीं

हौसला गर न तुम बढ़ाती मेरा बस खामोश रहकर
तुमको पाने की तमन्ना भी इस कदर मचलती नहीं

आशियाने में ही आजाओ मेरे इक सलीका लेकर
बेतरतीब सी जिंदगानी अब मुझसे संभलती नहीं

प्रकाश पाखी

रविवार, 5 अप्रैल 2015

एक कविता याद पुरानी

जिन गलियों में तुम और मैं
कदम कदम पर साथ चले
उन गलियों की उड़ती धूल
मन में मीलों महक रही है

चौराहे पर कितने घण्टे
बातें करते बिता दिए थे
मूंगफलियों के बिखरे छिलके
कुछ कुछ दानें मेरे भी थे

वो परीक्षा की तैयारी
कितनी रातों साथ जगे थे
चाय बनाना किसकी बारी
चुस्की चुस्की याद मुझे है

होटल की वो आधी चाय
पूरा पूरा दिन ले लेती
ऊंचे सुर के हंसी ठहाके
खुश खुश चेहरे आज कहाँ है

बारातों में घोड़ी आगे
नच नच भंगड़े जो किये थे
इक लड़की जो ताने कसती
खिल खिल हंसती यादों में है

मूवी में जो तीखी सीटी
बजा बजा कर मजे लिए थे
आगे बैठी सुंदर लड़की
अंदर अंदर बसी हुई है

मंदिर चढ़ कर चढ़े चढ़ावे
कर बंटवारा बांटे जो थे
उनको खाते देखे सपने
सच सच कहना आज कहाँ है
-प्रकाश पाखी
(जून 1994 को दोस्तों की याद में लिखी एक पुरानी कविता)

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

आसमान पे मन सवार क्यूँ



इस कदर दिल बेकरार क्यूँ
तेरे जिक्र का इंतज़ार क्यूँ

तेरी आरजू बस न और कुछ
आसमान पे मन सवार क्यूँ


हंस के ना कहो तोड़ दो ये दिल
कत्ल हो मेरा बारबार क्यूँ

काँटों से भरी तेरी राह क्यूँ
ईश्क हो मेरा तारतार क्यूँ

गर है प्यार जो नेमते खुदा
घर में प्यार के ग़म हज़ार क्यों

तुम हो जानती मेरे मन में क्या
बेरुख़ी अब मेरे यार क्यूँ।
-प्रकाश पाखी