गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

मोम सी तुम आती नज़र, बस पिघलती नहीं...

आसमाँ से जमीं सी तुम मगर मिलती नहीं
इस तरह मेरे ख़यालों से भी निकलती नहीं

आतिशे ईश्क का दरिया भी मैंने बहा डाला
मोम सी तुम आती नजर, बस पिघलती नहीं

उम्र की कमसिन नदी सी शुरुआत यहीं से है
कब जवानी भला इन ढलानों से फिसलती नहीं

हौसला गर न तुम बढ़ाती मेरा बस खामोश रहकर
तुमको पाने की तमन्ना भी इस कदर मचलती नहीं

आशियाने में ही आजाओ मेरे इक सलीका लेकर
बेतरतीब सी जिंदगानी अब मुझसे संभलती नहीं

प्रकाश पाखी

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