शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

फैमिली

चुप चुप सी होली जाती अब
ख़ामोशी से राखी आती
दीवाली को दिल बेगाने
कैसी सबकी है लाचारी

बचपन बीता, सबकुछ रीता
बंद बंद सी बोलचाल है
प्रेम प्यार भी खो गए सारे
अब छुप गयी है खुशियाँ सारी

कैसे किसको दिखलाना है
कैसे किसको नीचे लाना
बचा तो केवल अहम वहम है
और तानों की मारामारी

नफ़रत होती अपनों से अब
बेगानों से तगड़ी यारी
लहू के रिश्ते,लगें पराये
निभजाती है दुनियादारी

मतलब से सब मतलब रखते
मतलब की है रिश्तेदारी
सबसे पहले बदली भौजी
फिर भाइयों की आई बारी

छुटकी मुन्ना हुए बड़े अब
ताया भैया नज़र न आते
अपनों के अपमानों में अब
मिलती सबको ख़ुद मुख्तारी

बहनें भी कहाँ नज़र मिलाती
सुने वही जो सुनना चाहती
कमियां इतनी,रही गिनाती
उलाहनों से ममता हारी

सबके अपने अपने रस्ते
और खुशियों की अपनी बारी
मेरी तो बस फैमिली है
माँ बापू और जिम्मेदारी

प्रकाश पाख़ी

सोमवार, 25 जनवरी 2016

जुबाँ चुप रहे क्यूँ,तेरी हादसों पर

"दिखा लाल है रंग रंगों से ज्यादा
खतरनाक सड़कें हैं बमों से ज्यादा

बीमारी से ज्यादा और दंगों से ज्यादा
बहा खून सड़कों पर जंगों से ज्यादा"
***************************
ये तकरार है हो रही बोलियों पर
भड़कते हैं क्यूँ जात पर मजहबों पर

फड़कते है बाजू तेरे गोलियों पर
जुबाँ चुप रहे क्यूँ तेरी हादसों पर

नशा और सफ़र साथ करना कभी ना
कि तब मौत है नाचती रास्तों पर

जो रफ़्तार से बढ़ चले ज़िन्दगी में
थे उनके सफर थम गए हादसों पर

पहन लो ये हेलमेट बेल्ट अब लगा लो
बचोगे न तुम कर यकीं टोटकों पर

डरा मौत से हूँ नहीं आज तक मैं
गवारा नहीं है मरूं रास्तों पर


मेरा खून है तो अमानत वतन की
अगर मौत आये तो मरूं सरहदों पर

मुहाफ़िज़ न बच्चे न पैदल यहाँ पर
बड़ी बेरहम है सड़क सिग्नलों पर

ओ ईनाम लौटाने वालों कहो कुछ
मैं हैरान हूँ तेरी खामोशियों पर

प्रकाश पाखी

रविवार, 23 अगस्त 2015

मुझसे तुम कुछ कहना चाहो

उस पल को मैं ढूंढ रहा हूँ
सोचों में तुम बसना चाहो
भावों में तुम बहना चाहो
मुझसे तुम कुछ कहना चाहो

बीते पल जो कड़वे थे कुछ
आशाओं के टुकड़े थे कुछ
आंसू बनके निकले थे कुछ
अब तुम आगे बढ़ना चाहो
मुझसे तुम कुछ कहना चाहो

गुज़रे कल के अफ़सानों को
जो अपने थे उन बेगानों को
रोकर के निकाले तूफानों को
भूल के तुम अब हंसना चाहो
मुझसे तुम कुछ कहना चाहो

इन यादों की अंगड़ाईयों में
अंतर्मन की गहराइयों में
मेरी अपनी तन्हाइयों में
मेरे संग तुम रहना चाहो
मुझसे तुम कुछ कहना चाहो

अपने ग़म को मुझको देकर
खुशियों की हरियाली लेकर
जीवन के पथरीले पथपर
बन हमराही चलना चाहो
मुझसे तुम कुछ कहना चाहो...

प्रकाश पाखी।

मंगलवार, 12 मई 2015

न्याय

ऐसे कैसे पैसे से
बिक कर बस हो जाता न्याय
मासूमों को कुचल किनारे
थक कर फिर सो जाता न्याय

रूपये भर की रिश्वत पर
तीस साल तक केस चले
जेलों की कोठरियों में
जाकर फिर खो जाता न्याय

तगड़े तगड़े पैसे वाले
तगड़े उनके पैरोकार
हार मानकर हामी भरता
इनके घर जो जाता न्याय

अरबों खरबों लूट गए
देखो फिर भी छूट गए
रामम नामम सत्यम फिर
ऐसे ही हो जाता न्याय

ईंट ईंट का बना घरौंदा
तिनका तिनका छत बनी
बुलडोजर से बिखर जाए तो
हो बेघर रो जाता न्याय

पेट किसी का फाड़ दिया
लूटी अस्मत मार दिया
अब सुधरेगा कम आयु है
बच्चा तब हो जाता न्याय

धनवानों की रक्षा करता
उनका अपना प्यारा श्वान
हाथ गरीबों के तोते सा
उड़ जाता खो जाता न्याय।

प्रकाश पाखी।


रविवार, 10 मई 2015

सोने सी सच्ची वो मुझको रोज मनाती मेरी माँ



चैन से सारी रात मैं सोता, जागी रहती मेरी मां 
नींद उमचता जब भी मैं तो थपकी देती मेरी मां

आंगन में  किलकारी भर भर ता ता थैया दौड़ा था
जब भी गिरने लगता था मैं पीछे रहती मेरी मां

पट्टी पुस्‍तक, बस्‍ता देकर छोड़ तो आई थी मुझको 
शाला में रोता था मैं और घर पर रोती मेरी मां

गुस्से पर उसके गुस्सा कर मैं भूखा सो जाता था 
मेरे खाना खा लेने तक रहती भूखी मेरी मां

अपनी गलती पर भी झगड़ा कर मैं रूठा करता था
सोने सी सच्ची वो मुझको रोज मनाती मेरी माँ

 कक्षा में अव्वल आकर जब उसके अंक लिपटता था
आंखों में आंसू भर कर बस हंसती रहती मेरी मां

उम्र हुई है लेकिन अब भी वो जैसे की तैसी है
बेटे ने खाना खाया क्या पूछा करती मेरी माँ 

  प्रकाश पाखी 

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

आजनाइशों से मेरे ऐतबार गुज़रे है

हम गली से उनकी क्यों बार बार गुज़रे हैं
बे अना लगे उन्हें नागवार गुजरे है

बेरुखी थी फ़िक्र भी खिदमतों की चाह भी
आजमाईशों से मेरे ऐतबार गुज़रे हैं

चाहतों की जंग में गिर पड़े जो तुम तो क्या
राहे ईश्क गिर पड़े शहसवार गुज़रे है

जीत के जहाँ कई खाकसार हो गए
कोहे वक्त में कई जीत हार गुज़रे है

कौम पर जो मर मिटे जिंदगी उन्हीं की है
इस जहाँ में बाकि सब बन के भार गुज़रे है।

-प्रकाश पाखी
अना-स्वाभिमान.
कोहेवक्त-समय की गुफा

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

मोम सी तुम आती नज़र, बस पिघलती नहीं...

आसमाँ से जमीं सी तुम मगर मिलती नहीं
इस तरह मेरे ख़यालों से भी निकलती नहीं

आतिशे ईश्क का दरिया भी मैंने बहा डाला
मोम सी तुम आती नजर, बस पिघलती नहीं

उम्र की कमसिन नदी सी शुरुआत यहीं से है
कब जवानी भला इन ढलानों से फिसलती नहीं

हौसला गर न तुम बढ़ाती मेरा बस खामोश रहकर
तुमको पाने की तमन्ना भी इस कदर मचलती नहीं

आशियाने में ही आजाओ मेरे इक सलीका लेकर
बेतरतीब सी जिंदगानी अब मुझसे संभलती नहीं

प्रकाश पाखी