रविवार, 23 अगस्त 2015

मुझसे तुम कुछ कहना चाहो

उस पल को मैं ढूंढ रहा हूँ
सोचों में तुम बसना चाहो
भावों में तुम बहना चाहो
मुझसे तुम कुछ कहना चाहो

बीते पल जो कड़वे थे कुछ
आशाओं के टुकड़े थे कुछ
आंसू बनके निकले थे कुछ
अब तुम आगे बढ़ना चाहो
मुझसे तुम कुछ कहना चाहो

गुज़रे कल के अफ़सानों को
जो अपने थे उन बेगानों को
रोकर के निकाले तूफानों को
भूल के तुम अब हंसना चाहो
मुझसे तुम कुछ कहना चाहो

इन यादों की अंगड़ाईयों में
अंतर्मन की गहराइयों में
मेरी अपनी तन्हाइयों में
मेरे संग तुम रहना चाहो
मुझसे तुम कुछ कहना चाहो

अपने ग़म को मुझको देकर
खुशियों की हरियाली लेकर
जीवन के पथरीले पथपर
बन हमराही चलना चाहो
मुझसे तुम कुछ कहना चाहो...

प्रकाश पाखी।

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