गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

सोने सी सच्ची वो मुझको रोज मनाती मेरी माँ





चैन से सारी रात मैं सोता, जागी रहती मेरी मां 
नींद उमचता जब भी मैं तो थपकी देती मेरी मां

आंगन में  किलकारी भर भर ता ता थैया दौड़ा था
जब भी गिरने लगता था मैं पीछे रहती मेरी मां

पट्टी पुस्‍तक, बस्‍ता देकर छोड़ तो आई थी मुझको 
शाला में रोता था मैं और घर पर रोती मेरी मां

गुस्से पर उसके गुस्सा कर मैं भूखा सो जाता था 
मेरे खाना खा लेने तक रहती भूखी मेरी मां

अपनी गलती पर भी झगड़ा कर मैं रूठा करता था
सोने सी सच्ची वो मुझको रोज मनाती मेरी माँ

 कक्षा में अव्वल आकर जब उसके अंक लिपटता था
आंखों में आंसू भर कर बस हंसती रहती मेरी मां

उम्र हुई है लेकिन अब भी वो जैसे की तैसी है
बेटे ने खाना खाया क्या पूछा करती मेरी माँ 

  प्रकाश पाखी 
समीर जी की एक पोस्ट उन्होंने अपनी माँ पर लिखी थी ...काफी देर तक पढ़ कर कुछ भी नहीं कह पाया कुछ पंक्तियाँ जेहन में आई और कई दिनों तक अपनी माँ से दूर रहने से उनकी याद आई और आँखों में कुछ नमी सी आई ...वह एक ऐसी पोस्ट थी जिसे पढ़ कर कुछ भी टिप्पणी नहीं कर पाया...उन पंक्तियों को गुरुदेव पंकज सुबीर जी को भेज दी...सोचकर कि कुछ सुधार हो जाए...पर लम्बे समय तक कोई जवाब नहीं आया तो सोचा कि चलो भूल जाएं...फिर अचानक गुरुदेव के एक मेल में तराश कर वापस भेजी पंक्तियाँ देख सुखद आश्चर्य हुआ...मेरे सीधे सादे भाव अब एक बहर में थे जो आपने पढ़े...मेरे लिए यह गुरुदेव की दी गयी नायब भेंट थी...एक दम ख़ास और निजी!इस गजल में खास बात यह है कि गुरुदेव ने लगभग हर पंक्ति में सुधार किया पर मूल भाव में कोई अंश मात्र भी बदलने दिया ...हर पंक्ति अपने मूल भाव को ही लय के साथ अभिव्यक्त कर रही थी.मन में आया कि इसे मित्रों से साझा किया जाए तो ब्लॉग पर पर प्रस्तुत कर रहा हूँ...

12 टिप्‍पणियां:

  1. पट्टी पुस्‍तक, बस्‍ता देकर छोड़ तो आई थी मुझको
    शाला में रोता था मैं और घर पर रोती मेरी मां

    ग़ज़ल खुद परवाज़ पर है गुरु जी के आशीष के बाद पाखी भाई .
    खूब कही आपने ग़ज़ल ... पत्थर को हीरा बना देते हैं गुरुदेव अपने छूने मात्र से ...
    ऊपर वाले शे'र में बचपन याद दिला दी और आखिरी वाला शे'र अभी तम अपने पास है बधाई हो ...

    अर्श

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  2. अद्वितीय ग़ज़ल कही गयी है...इसके लिए प्रशंशा के सभी शब्द अधूरे हैं...आप की भावनाओं और गुरूजी के मिडास टच को नमन...हर शेर लाजवाब.
    नीरज

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  3. अभी इतना होशियार नहीं हो पाया हूँ कि इस गजल पर कुछ कह सकूं
    पूरी गजल अपनी सी लगी
    पट्टी पुस्‍तक, बस्‍ता देकर छोड़ तो आई थी मुझको
    शाला में रोता था मैं और घर पर रोती मेरी मां
    और इस शेर पर तो अटक कर रह गया

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  4. बहुत सुन्दर ...ह्र्दय को छूती रचना है।

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  5. गुस्से पर उसके गुस्सा कर मैं भूखा सो जाता था
    मेरे खाना खा लेने तक रहती भूखी मेरी मां


    -आज भावुक कर गये...बस्स!!

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  6. aanhein nam ho gayi....bahut sundar....http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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  7. बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने! रचना की हर एक पंक्तियाँ दिल को छू गयी! इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई !

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  8. सुन्दर!अति सुन्दर!
    बेहद भावपूर्ण रचना जो निश्चित ही भगवान् के साक्षात अवतार को समर्पित है!
    कुंवर जी,

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  9. बड़ी भावुक करती सी ग़ज़ल कही है आपने कि हर शेर अपना सा लगता है..सच मे इस रिश्ते पे जितना भी लिखा-पढ़ा जाय कम लगता है..प्रेम का यह सबसे पहला और शुद्धतम रूप होता है जिससे हमारा साक्षात्कार होता है..और अपरिवर्तनीय भी..

    उम्र हुई है लेकिन अब भी वो जैसे की तैसी है
    बेटे ने खाना खाया क्या पूछा करती मेरी माँ

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  10. अपनी गलती पर भी झगड़ा कर मैं रूठा करता था
    सोने सी सच्ची वो मुझको रोज मनाती मेरी माँ
    कक्षा में अव्वल आकर जब उसके अंक लिपटता था
    आंखों में आंसू भर कर बस हंसती रहती मेरी मां
    ...Maa har haal mein rahkar apne bachhon ka khyal rakhna nahi bhulti...
    Maa ko samparpit bhavpurn rachna.....
    Haardik shubhkamnayne.

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  11. प्रकाशजी नमस्कार,
    किशोरजी के ब्लॉग पर आपका कमेन्ट देखा और चला आया, माँ के बारे में कितनी सच्ची पंक्तियाँ हैं, आज भी जब टूर पे होता हूँ तो माँ ज़रूर पूछती है.. खाना खाया क्या?

    उम्र हुई है लेकिन अब भी वो जैसे की तैसी है
    बेटे ने खाना खाया क्या पूछा करती मेरी माँ

    आप होर्न प्लीज़ .. ओके .. से बहुत बहुत अच्छा लिखतें हैं, आज ही आपको follow करना शुरू कर रहा हूँ. इंतज़ार रहेगा आपकी अगली पोस्ट का.


    regards
    मनोज खत्री

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