मंगलवार, 12 मई 2015

न्याय

ऐसे कैसे पैसे से
बिक कर बस हो जाता न्याय
मासूमों को कुचल किनारे
थक कर फिर सो जाता न्याय

रूपये भर की रिश्वत पर
तीस साल तक केस चले
जेलों की कोठरियों में
जाकर फिर खो जाता न्याय

तगड़े तगड़े पैसे वाले
तगड़े उनके पैरोकार
हार मानकर हामी भरता
इनके घर जो जाता न्याय

अरबों खरबों लूट गए
देखो फिर भी छूट गए
रामम नामम सत्यम फिर
ऐसे ही हो जाता न्याय

ईंट ईंट का बना घरौंदा
तिनका तिनका छत बनी
बुलडोजर से बिखर जाए तो
हो बेघर रो जाता न्याय

पेट किसी का फाड़ दिया
लूटी अस्मत मार दिया
अब सुधरेगा कम आयु है
बच्चा तब हो जाता न्याय

धनवानों की रक्षा करता
उनका अपना प्यारा श्वान
हाथ गरीबों के तोते सा
उड़ जाता खो जाता न्याय।

प्रकाश पाखी।


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